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Monday, December 31, 2012

ABHIBYAKTI.....: विदा हो गई बेटी..........

ABHIBYAKTI.....: विदा हो गई बेटी..........: असमय विदा हो गई बेटी बिना डोली ........बिना पीले हाथ, दे गई माँ को ढेरों अश्रु और आजन्म का संताप...........। कहती थी- माँ मैं पढूं...
बेटी 
और जंगल 
दोनो को बचाना है 
बेटी है 
तो कल है 
जंगल से 
खेत -खलिहान है  
हवा है और जल है
सच मानो तो 
बेटी और जंगल ही 
हर समस्या का हल है।
- सुशील गैरोला ©2012

Sunday, December 30, 2012

विदा हो गई बेटी..........

असमय
विदा हो गई बेटी
बिना डोली ........बिना पीले हाथ,
दे गई माँ को
ढेरों अश्रु
और आजन्म का संताप...........।
कहती थी-
माँ मैं पढूंगी, आगे बढूँगी
तेरे लिए
माँ मैं भैया सी जमाने से लडूंगी
पर कलयुगी दुश्शासनों ने उसे मार डाला
अंग भी वस्त्रों सा तार डाला पापियों ने
हो रहां है कृत्य  कैसा
राम तेरे देश मैं
घूमते हैं कई भेड़िये मानव भेष में
बेटियाँ कैसे रहेंगी फिर सुरक्षित
इस परिवेश में।
- सुशील गैरोला ©2012

ABHIBYAKTI.....: सबसे बड़े लोकतंत्र का सच.....

ABHIBYAKTI.....: सबसे बड़े लोकतंत्र का सच.....:  सबसे बड़े लोकतंत्र का सच पिछले दिनों राजपथ की सडकों पर दिखाई दिया। यह समझ से परे था की सबसे बड़े लोकतंत्र का वासी होने पर हम खुशी मनाए...

सबसे बड़े लोकतंत्र का सच.....

 सबसे बड़े लोकतंत्र का सच पिछले दिनों राजपथ की सडकों पर दिखाई दिया। यह समझ से परे था की सबसे बड़े लोकतंत्र का वासी होने पर हम खुशी मनाएं या दुखी हों। कभी कभी तो स्कूल में पढी लोकतंत्र की परिभाषा भी झूठी लगाती है। जिस देश में संसद ऐसे तालिबानी फैसले ले, जनता की जायज मांगों को अनसुना करे, जनता निरपराध सड़कों पर पिटती रहे, मरती रहे और सरकार आम आदमी और उसकी मागों को दफन करती रहे। पिछले बरस जन लोकपाल के लिए समूचा भारत सड़को  पर आ गया था किन्तु सरकार ने जनता की सुनना तो दूर उल्टा उस आन्दोलन को दबाने और तोड़ने में पूरा जोर लगाया। जिसकी परिणति यह हुई की आज न टीम अन्ना  है ना जनलोकपाल। पिछले माह सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बदले के लिए संविधान ससोधन किया। देश की 80 फीसदी आवादी के साथ अन्याय। लोग सडकों पर आये, सरकारी काम काज ठप्प रहा परन्तु सरकार को सिर्फ 20 फीसदी लोगों की आवाज सुनाई दी। पुन: सोचने पर विवश हो जाना पडा की यह सरकार किसकी ही आम आदमी की या सोनिया की। पिछले दिनों दिल्ली जिसे न जाने क्या क्या और कैसा कैसा बनाने के दावे किये जा रहे हों में एक छात्रा के साथ जो क्रूर और जघन्य अपराध हुआ उससे सभी विज्ञ हैं। देश भर में  छात्र-जनता सडकों पर थी और उन पापियों को मृत्यु दंड देने के लिए सरकार से फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की मांग कर रही थी तो सरकार मैं बैठे लोग आन्दोलन को कुचलने की तरकीब बना रहे थे। और फिर टूटा सरकार का गुस्सा आम आदम पर। कुछ फैसले जिनके लिए लोग आंदोलित हों और सरकार के कानो में जूं भी नहीं रेंगती वहीं कुछ फैसले जो नाजायज हों और सरकार तुरंत ले ले सरकार की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। वहीं सोनिया को भी कठघरे में लाते हैं (क्योंकि सरकार का रिमोट तो इन्ही के पास है और वो इसका क्रैडिट अपनी सुविधानुसार लेती भी हैं)। 
जनता  की परवाह न करते हुए-
रातों रात- राज्यसभा और लोकसभा  में पदोन्नति में आरक्षण का बिल  रातों रात- रामलीला मैदान में लाठी चार्जरातों रात- सिंगापुर का पासपोर्ट,वीसा रातो रात- लड़की की मौत की खबर भी दीरातो रात- लड़की को वापिस भी लाये रातों रत- लड़की का अंतिम संस्कार भी कर दिया रातों रात- सरकार और विपक्ष द्वारा दो-दो तमाशबीन भी तय कर लिए गए मिल-जुल कर ! कांग्रेस की और से गृह राज्यमंत्री आर.पी.एन.  सिंह और सांसद महाबल मिश्र ! भा.जा.पा. की और से विजेंदर गुप्ता और जगदीश मुखी !बस हम और आप की बात का फैसला नहीं हो सकता - रातों रात.पीड़ित लडकी के पिताजी ने कहा की मै अपने बेटी का अंतिम संस्कार अपने यूपी के बलिया जिले के अपने गाँव में गंगा नदी के किनारे करना चाहता था क्योकि मेरे खानदान का अंतिम संस्कार वही होता है ..लेकिन सरकार ने मेरी बेटी का पार्थिव शरिर अपने कब्जे में लिया .. यहाँ तक मेरे कुछ रिश्तेदारों को भी आने का इंतजार नही किया और सरकार ने ही मेरी बेटी के शव को जबरजस्ती जला दिया .. उसने कहा की मै अपने गाँव में जाकर फिर से वैदिक रीती रिवाजो से अपने बेटी के काल्पनिक शव का अंतिम संस्कार करूंगा .मेरी बेटी के जिन्दा शरीर के साथ भी जबरजस्ती की गयी फिर सरकार ने उसके शव के साथ जबरजस्ती की। वाह री सरकार ..........आम आदमी के गले में तेरा हाथ। 

Thursday, December 13, 2012

"आम आदमी की सरकार"


विश्व मानव अधिकार दिवस पर अपनी जायज मांगों के लिये आन्दोलन कर रहे शिक्षा मित्रों पर तथाकथित "आम आदमी की सरकार" ने जिस तरह की बरबरता की उसकी बानगी सभी ने इलैक्ट्रानिक मीडिया व प्रिन्ट मीडिया मैं साफ़ तौर पर देखी।  सफ़ेदपोश आकाओं के इशारे पर मित्र पुलिस द्वारा की गई ऎसी क्रूरता देखकर लोकतन्त्र को धिक्कारने का मन करता है। क्या यही वास्तविक लोकतन्त्र है ? और ये आम आदमी की सरकार? एसा पहली बार नहीं है.....! जब समूचा उत्तराखण्ड प्राकृतिक आपदाओं से ग्रसित था और सैकड़ों लोग निराश्रय का जीवन जी रहे थे, तो इसी सरकार के कुछ भद्र जनप्रतिनिधि लंदन औलम्पिक के सैर सपाटे पर थे। जो राजधानी में थे वे इलैक्ट्रानिक मीडिया मैं चिकन तन्दूरी की दावत उड़ाते दिखाई दे रहे थे, जबकि कई बेघर लोग अन्न के एक-एक निवाले को तरस रहे थे। पुनर्वास का मुद्दा उठा, तो सरकार ने पैंसो का रोना रोया लेकिन इसी सरकार की एक काबीना मन्त्री और इन्ही के एक सांसद के पुत्र की राजशी शादी पर हुए करोड़ो के अपब्यय को जनता ने देखा।  सरकार बनने से अब तक ब्यक्तिगत सितारगंज की विजय और रविवासरीय दिल्ली दौरों के सिवाय माननीय मुख्यमन्त्री जी के पास अपने अब तक के शासन की कुछ भी उपलब्धि  गिनाने को नहीं है। सरकार चलाने वाले ही ब्यक्तिगत स्वार्थों के लिये उसके अंजर-पंजर ढीले करने पर तुले हैं। रूठने और मनाने के इस खेल में योजनाऎं बस मुंह ताके खड़ी है और पैंसा खर्च न होने की बेबसी पर रो रहा है। और अब शिक्षकों पर ये पुलिसिया बरबरता। "धिक्कार है" ऎसे लोकतन्त्र पर और "धिक्कार है" ऎसी "आम आदमी की सरकार" पर!

©susheelgairola2012

Sunday, September 16, 2012

ABHIBYAKTI.....: Kaash! humne us rishte ko koi NAAM na diya hota....

ABHIBYAKTI.....: Kaash! humne us rishte ko koi NAAM na diya hota....: Wo tumhara milna yakayak ek sapne sa dikhai dena aankh lagte hi...... do-char alfazon ki han-na aur fir wo "DoSTi" ta-umr saath nibhane ke d...

ABHIBYAKTI.....: विफ़ल रहे आन्दोलन से.....

ABHIBYAKTI.....: विफ़ल रहे आन्दोलन से.....: मेरे एकाकी होने का मेरा मर्म... उस पर उद्द्वेलित  विचारों का तवा गर्म हो कभी लेखनी से गुस्ताखी या जिव्व्हा की फ़िसलन बेशर्म तो माफ़ करना मित्...

ABHIBYAKTI.....: मेरा वजूद ...

ABHIBYAKTI.....: मेरा वजूद ...: कल पूछ बैठा मुझसे मेरा वजूद तुम आज-कल दिखाई नहीं देते..! "बिज़ी" हो क्या...? और ये कौन सा आन्दोलन चला रहे हो... "समतावादी" खुद को आईन...

मेरा वजूद ...

कल पूछ बैठा
मुझसे मेरा वजूद
तुम आज-कल दिखाई नहीं देते..!
"बिज़ी" हो क्या...?
और ये कौन सा आन्दोलन चला रहे हो...
"समतावादी"
खुद को आईने में कब से नहीं देखा..?
मैंने एक हलकी सांस ली
सोचा आज तो इसके एक-एक प्रश्न का दूंगा उत्तर
तभी किचिन से आवाज आई

" अभी तक बैठे हो! आज दूध लेने नहीं जाना है क्या...?"
वजूद हंस रहा था....
मैं उत्तर जरूर दूंगा
फिर कभी....!
                            - सुशील गैरोला



©Susheel Gairola.2012

Monday, September 10, 2012

विफ़ल रहे आन्दोलन से.....

मेरे एकाकी होने का मेरा मर्म...
उस पर उद्द्वेलित  विचारों का तवा गर्म
हो कभी लेखनी से गुस्ताखी
या जिव्व्हा की फ़िसलन बेशर्म
तो माफ़ करना मित्रो....!
प्राणोहुति के बाद भी विफ़ल रहे
आन्दोलन से.....
सीख लिया है सच बोलने का धर्म..!








©susheelgairola2012

Monday, August 20, 2012

मेरी सोच में उसे खोट नजर आता है....

मेरी सोच में उसे खोट नजर आता है
पर आरक्षण के झुनझुने में वोट नजर नहीं आता है
मै  स्कूल में उसके हाथों की चाय रोज पीता हूँ
वो बुलाने पर भी मेरी शादी में नहीं आता है
मुझसे पहले वो रोज मंदिर में चला जाता है
कई बार मुझको भी टीका लगाता  है
मेरी तरह जींस और शर्ट पहनने की
कोशिश रहती है हमेशा उसकी
मुझको भाई साब कहती है बीबी उसकी
मेने सादगी से उनके हाथों के मालपुए भी खाए हैं
5 लाख के कर्ज में भी उसे बड़ा मेरा नोट नजर आता है
में कभी खुद को ब्रह्मण नहीं कहता
बस इसी लिए ......
मेरी सोच में उसे खोट नजर आता है
पर आरक्षण के झुनझुने में वोट नजर नहीं आता है .....