Total Pageviews

Sunday, October 23, 2011

और कितनी बार ...

मेरी खामोशियों
मेरी तन्हाइयों
और मेरी उदास शामों से
कितनी और दीपावलियों के चिराग
पूछेगें सवाल !
और कितनी बार
आसमान ताक कर
में सिर्फ़ मुश्कराता रहूंगा
ऐसा ना हो
मेरे सब्र की इन्तहा खत्म हो जाये
इसलिये चले आओ इस दीपावली पर
जलाने वो चिराग
जिन्हे तुम बुझा आई थीं
कुछ बरस पह्ले
तेल की कुछ बूदें
शेष ! रहने से पहले .
- सुशील गैरोला




और कितनी बार......

मेरी खामोशियों
मेरी तनहाइयों
और मेरी उदास शामों से
कितनी और दीपावलियों के चिराग
पूछेंग सवाल !
और कितनी बार
आसमान ताक कर
में सिरफ़ मुशकरता रहूंगा
ऐसा ना हो
मेरे सब्र की इनतहं खतम् हो जाये
इसलिये चले आओ इस दीपावली पर
जलाने वो चिराग
जिनहे तुम बुझा आई थी
कुछ बरस पहले
तेल कि कुछ बूदें
शेष ! रहने से पेहले ।
- सुशील गैरोला