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Tuesday, December 20, 2016

मैं जंग में हूँ।
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जंग है खुद से
और जंग है
अपने किरदार की
खोखली नुमाइश से
जंग अपनी कशमकश से
खुद में खुद को
तलाशने की आजमाइश से
जंग है मुखौटों में छुपे
अपनों को पा लेने की ख्वाइश से
जंग भीतर है जंग बाहर
जंग शांति के चाह की
हर एक गुंजाइश से
वक़्त दो मुझे कुछ
अभी मैं जंग में हूँ।
------------------------------/सुशील गैरोला© /2017/

Thursday, January 29, 2015

फिर से ......

धीरे धीरे
पिघल रहा है
यादों की सतहों से चिपका
बर्फ़ीला एकाकीपन
सुलगा गया फिर एहसास कोई
...............खामोशी से ।
बहने लगा हवाओं में
फिर से रंगत भरी फिज़ाओं मे
चिराग लिए आया है कोई
दीप जलाने
मेरी सुनी अंधियारी कुटिया का ।
धूल पौंछ कर देखी मैंने
चित्र कोश की सब तस्वीरें
वैसे ही अब भी हो
जैसे हंस बोल रहे थे
...................वर्षों पहले।
ना मैं बदला
ना ही तुम  
बदल गई तारीखें लेकिन
हाँ कुछ पल बदले
एकाकी के गुमसुम
अब बदलेंगे मिलकर कल
.प्रीतम..................साझे पल।
 -सुशील गैरोला©2015


Thursday, January 8, 2015

"मुझे याद है"

मुझे याद है
वो मिट्टी के ढेरों से गाँव
गांवो के मटियाले चेहरे मासूम
पीपल की ठंडी छाँव
मुझे याद है
माँ के तन से लिपटी
गीली मिट्टी की सौंधी खुशबू
मेलों खेलों की धूम मुझे याद है।
वो
शैशव की सैतानी
ननिहाल की बूढ़ी प्यारी नानी
नन्हें हाथों को थामे
पगडंडी पर टहलाते नाना
गर्म तवे सा हुक्के का साज
वो गुड़-गुड़ की मीठी आवाज
मुंह से नाना जी का धुआँ उड़ना
मुझे याद है।

मुझे याद है
वो तालाब पुराना
डुबकियाँ लगाना
बापू के संग खेतों मे जाना
वो खाना लंबी रातों का
वो डर दादी के किस्से बातों का
हलचीरों पर नन्हें कदम टिकaना
मुझे याद है।

मुझे याद है
रंभा की रंभाती बछिया
घुर्राते बैल मवाली
हरियाले जंगल लहराती हरियाली
और बुआ की छुन-छुन हंसिया
मुझे याद है।

वो
स्कूल की घंटी का बजना टन-टन
छुट्टी होने पर हर्षया चंचल मन
वो बस्ता-पाटी, बिछुड़े सहपाटी
लुका छिपी और घिस्सापाटी
पीयूल पर फैसला अल्हड़ बचपन
मुझे याद है।

( हलचीर: खेतों मे हल लगाने के पश्चात बनी उभरी मिट्टी की लकीरें
  पीयूल : चीड़ के सूखे पत्तों का ढेर)
 -सुशील गैरोला©2015

Wednesday, December 31, 2014

बीत गया एक वर्ष और
    फिर दीवा स्वप्न मे सोते,
        नवीन वर्ष की आस लगाए
                  अपने भाग्य को रोते। 

गिन गिन कर सब दुख अपने,
        जोड़ रहे टुकड़े टुकड़े सपने। 

                     नवीन वर्ष के तिथि बारों मे,
                                     फिर से इन्हे सँजोते।। 


प्रेम का मायाजाल पड़ा था,
       जमाना बन दीवार खड़ा था।
                  पत्थर से सर टकराते सोचा,
                                "तुम काश हमारे होते"।
गरम गैस के गुब्बारों सा,
      हंसी खुशी के फब्बारों सा।
                  भूल गये दुख के शूलों को,
                               जो निश दिन हमे चुभोते।।
पर बैभव देख सकी ना आँखें,
       लूटा सबने और भर ली सांके।
                   पाते हम भी धन आपार,
                         पर अपनी मानवता को खोते॥
शांति मंत्र का जाप भूलाकर,
             दुखियारों पर कहर ढहा कर।
                     बन बैठे हम तानाशाह,
                            खेत-खलियानों मे बंदूकें बोते ।।  

इस नवीन गीत को मिलकर गायें,
               आओ एक संकल्प उठाएँ।
                        बीत जाये न ये वर्ष भी,
                                   स्वप्नों की माला को पिरोते।।
बीत गया एक वर्ष और,
             फिर दिवास्वप्न मे सोते।
                       नवीन वर्ष की आस लगाए,
                                       अपने भाग्य को रोते।।


नूतन वर्ष   2015 की हार्दिक शुभकामनाएँ।
 -सुशील गैरोला©2014

Saturday, October 25, 2014

वो आ रहे हैं

वो आ रहे हैंजी हाँ उन्हे खबर है की हमारी दुखती नस कहाँ हैइसलिए इस बार वो हमारे दारुणहर्ता बन दुखों को दूर करने के कई सब्जबाग लेकर आ रहे हैं।होशियार रहें..... वो नकाब ओढ़े
खुद को हम सा जताएँगे 
हमारे दर्द में अपनी छटपटाहट दिखाएंगे दुर्गम के गम दूर करने के रंगीन वादों के साथफिर हमें लूट लेने के इरादों के साथ हमारे जख्मों पर फेरने मरहमी हाथ
.....
वो आ रहे हैं।मुझे सुनाई दे रही है शकुनि षडयंत्रों की सुगबुगाहटअनगिनत शजिशों की आहटहम जैसे दिखें इसलिए हमारे हालात से लड़े से हमारी मुसीबतों से भिड़े से और हमारे हकों के लिए खड़े से वो हमारे दर्द के गीत गा रहे हैं.
.................. वो आ रहे हैं। 
-सुशील गैरोला©2014

Monday, December 30, 2013

"मैं अकेला हूँ"



अजनवी
है शहर
मैं
अकेला हूँ।
रास्ता अन्तहीन और
खत्म होता नहीं सफर
मैं
अकेला हूँ।
तेरी यादें
जो धूप और छाँव सी
आती थी वियावन मैं
वो भी अब
जाने गई किधर
मैं
अकेला हूँ।
सितारे
नजर आते नहीं
चाँद आता है चला जाता है
पल भर ही जाये ठहर
मैं
अकेला हूँ।
सर्द
दिन हैं उदास
रातें हैं
खामोश सरहदों के बीच
डरता है यहाँ डर
मैं
अकेला हूँ।
- सुशील गैरोला 
 ©2013

"तुम्हारा एहसास"



पलकें
बंद करता हूँ तो
पाता हूँ...तुम्हें
तुम्हारा मुस्कराना हौले से
आंखो से बतियाना
और न जाने
कितनी ही बातें
बायाँ करती हैं
तुम्हारे एहसास को
तुम्हारे......प्यार को।
तुम्हारा
पलकों की ओट से देखना
और फिर शर्मा कर छुप जाना
उन्हीं के भीतर
बहुत कुछ बता जाना
कुछ भी न जता कर
बढ़ा देता है मेरी धड़कनों को
वो रूमानी स्पर्श
दे जाता है कितना स्नेह
जीवन के अधूरेपन को भरने की
मेरे कोशिश मे यूं ही रहना
सदा साथ
तुम और तुम्हारी याद
और मैं
घुलता जाऊंगा तुम्हारे प्यार में
दूध मे मिश्री की तरह।
----- सुशील गैरोला