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Thursday, December 13, 2012

"आम आदमी की सरकार"


विश्व मानव अधिकार दिवस पर अपनी जायज मांगों के लिये आन्दोलन कर रहे शिक्षा मित्रों पर तथाकथित "आम आदमी की सरकार" ने जिस तरह की बरबरता की उसकी बानगी सभी ने इलैक्ट्रानिक मीडिया व प्रिन्ट मीडिया मैं साफ़ तौर पर देखी।  सफ़ेदपोश आकाओं के इशारे पर मित्र पुलिस द्वारा की गई ऎसी क्रूरता देखकर लोकतन्त्र को धिक्कारने का मन करता है। क्या यही वास्तविक लोकतन्त्र है ? और ये आम आदमी की सरकार? एसा पहली बार नहीं है.....! जब समूचा उत्तराखण्ड प्राकृतिक आपदाओं से ग्रसित था और सैकड़ों लोग निराश्रय का जीवन जी रहे थे, तो इसी सरकार के कुछ भद्र जनप्रतिनिधि लंदन औलम्पिक के सैर सपाटे पर थे। जो राजधानी में थे वे इलैक्ट्रानिक मीडिया मैं चिकन तन्दूरी की दावत उड़ाते दिखाई दे रहे थे, जबकि कई बेघर लोग अन्न के एक-एक निवाले को तरस रहे थे। पुनर्वास का मुद्दा उठा, तो सरकार ने पैंसो का रोना रोया लेकिन इसी सरकार की एक काबीना मन्त्री और इन्ही के एक सांसद के पुत्र की राजशी शादी पर हुए करोड़ो के अपब्यय को जनता ने देखा।  सरकार बनने से अब तक ब्यक्तिगत सितारगंज की विजय और रविवासरीय दिल्ली दौरों के सिवाय माननीय मुख्यमन्त्री जी के पास अपने अब तक के शासन की कुछ भी उपलब्धि  गिनाने को नहीं है। सरकार चलाने वाले ही ब्यक्तिगत स्वार्थों के लिये उसके अंजर-पंजर ढीले करने पर तुले हैं। रूठने और मनाने के इस खेल में योजनाऎं बस मुंह ताके खड़ी है और पैंसा खर्च न होने की बेबसी पर रो रहा है। और अब शिक्षकों पर ये पुलिसिया बरबरता। "धिक्कार है" ऎसे लोकतन्त्र पर और "धिक्कार है" ऎसी "आम आदमी की सरकार" पर!

©susheelgairola2012

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